मंगलवार, 29 मई 2012

मोदी ने उस सत्पुरुषो से क्या कहा

मोदी के साथे बौद्ध शिष्टमंडल, देखते हैं, कौन बुद्ध बनता है और कौन बुद्धु

हिन्दुत्व में विश्वास करो, क्योंकि मैंने आप को कहा है;
हिन्दुत्व में विश्वास करो, क्योंकि आप के पुरखों ने कहा है;
हिन्दुत्व में विश्वास करो, क्योंकि वह आप की परंपरा में है;
हिन्दुत्व में विश्वास करो, क्योंकि ऐसा शास्त्रो में लिखा है;
हिन्दुत्व में विश्वास करो, क्योंकि वह बहुमती का मत है (और जो बहुमती मानती है, वह नैसर्गिक तौर पर सेक्युलारीज़म ही है);
हिन्दुत्व में विश्वास करो, क्योंकि (चुनाव से पहले) वह मुसलमान-विरोधी है, और (चुनाव के बाद) सदभावना है.


बुधवार, 23 मई 2012

गुजरात पुलीस की धर्मसेवा


गुजरात के इडर शहर के पुलीस स्टेशन का बोर्ड, जिस पर गुजरात
पुलीस के एम्बलम के उपर लिखा है, धर्मसेवा



गुजरात में मोदी ने पुलीस को जमीन के दलालों की भी दलाल बना दी है, ऐसा हमने अमदावाद आए मानव अधिकार आयोग से कहा था. मगर हम गलत थे. गुजरात में संघ के प्रचारक ने पुलीस को सिर्फ जमीन माफीया की दलाल ही नहीं बल्कि धर्म सेवा में भी लगा दी है. गुजरात के इडर शहर के पुलीस स्टेशन पर कल हमने जो देखा उसकी तसवीर यहां रखी है.

हमारी गुहार पर मानव अधिकार आयोग ने गुजरात के पुलीस महानिर्देशक चित्तरंजनसिंह को जब ऐसे होर्डींग्स, बोर्ड्स निकाल देने के आदेश दिए, तब डीजी बता रहे थे कि ऐसे होर्डींग सिर्फ अमदावाद शहर में ही है, मगर यह इडर शहर के बोर्ड के बारे में डीजी का क्या कहना है? और इस बोर्ड में तो कोई यात्री टायर्स का इस्तहार भी है. और गुजरात पुलीस के एम्बलम पर लिखा है, 'धर्मसेवा'

पीछले दस साल से गुजरात पुलीस द्वारा किए गए कार्यों से इस धर्मसेवा का मतलब हम समज सकते हैं. गुजरात पुलीस के लिए धर्मसेवा का अर्थ है, मुसलमानों पर जवाबी कारवाई हो तब चुपचाप खडे रहेना, फेइक एन्काउन्टरों में निर्दोष मुसलमानों को मौत के घाट उतारना. गुजरात पुलीस धर्मसेवा का बहुत अच्छा अर्थ समजती है. धर्मसेवा का मतलब है, गांवों में दलितों पर अत्याचार के वक्त सवर्णों को साथ देना. धर्मसेवा का मतलब है, एट्रोसीटी एक्ट का कतई अमल न करना. धर्मसेवा का मतलब है, हिन्दुओं में त्रिशुल बांटनेवालों को उचित रक्षण देना. धर्मसेवा का मतलब है, मर्यादा पुरुषोत्तम नरेन्द्र मोदी के लिए वनवास (सोरी, जेलवास) तक झेलना.

सेक्युलर देश में पुलीस का कोई धर्म नहीं होता. पुलीस का काम है कानून की रखवाली. पुलीस को कोई धर्म से लेना देना नहीं है. गुजरात की पुलीस को मोदी ने कट्टरपंथ का जहर पीलाया है, इसका इससे बडा प्रमाण क्या होगा? हमारा पूरे देश के सेक्युलर लोगों से नम्र निवेदन है कि आप चंद मिनट निकालकर मानव अधिकार आयोग, गुजरात हाइकोर्ट के चीफ जस्टीस तथा सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टीस को जरूर एक पत्र लिखें. आप अगर ऐसा सोचते रहें कि हमारे हाथ में सत्ता नहीं है, हम क्या कर सकते है या हमारे हाथ में सत्ता आएगी तब हम कुछ करेंगे तो मेरी बात ध्यान से सून ले. आप से बडा बेवकूफ कोई नहीं होगा.  


रविवार, 6 मई 2012

माइग्रन्ट विरुद्ध वाइब्रन्ट



'वाइब्रन्ट' गुजरात की चकाचौंध की जिस कहानी सांप्रत गुजरात के शासकों द्वारा बार बार दोहराई जा रही है, उस कहानी को अंजाम देने के लिए बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ, उत्तरप्रदेश, राजस्थान के हजारों, लाखों 'माइग्रन्ट' मजदूरों ने अपनी जिंदगियों में कितना अंधेरा झेला है, और जिस 'पावर-सरप्लस' गुजरात की डींगे लगाई जा रही है, उस गुजरात की समृद्धि के पीछे झारखंड, छत्तीसगढ की कोयले की खदानों का निरंकुश उत्खनन कितना जिम्मेदार है, यह सवाल आज सूरत में बुलाए गए बिहार शताब्दी उत्सव के आयोजकों को पूछने जैसा है.

तथाकथित 'पावर-सरप्लस' गुजरात आज 18,000 मेगावोट बीजली पैदा करने की स्थिति में है, ऐसा 'पायोनियर' से बात करते हुए गुजरात के पावर-पेट्रोलीयम सचिव पांडीयन ने कहा. उसमें 13,500 मेगावोट बीजली थर्मल पावर स्टेशनों में बनती है. देश की 70 फीसदी बीजली थर्मल पावर स्टेशनों से आती है, जो बीजली पैदा करने के लिए कोयले का इस्तेमाल करते हैं. भारत में आज 267 अरब टन कोयला अभी भी जमीन में सुरक्षित है. इन में से ज्यादातर कोयला ओरीस्सा, छत्तीसगढ और झारखंड की खदानों में है. आज तक गुजरात के मांचेस्टर अहमदाबाद की टेक्सटाइल मीलों को चलाने के लिए इन्ही कोयले का इस्तेमाल हुआ. झारखंड अब तक बिहार में था और थर्मल पावर स्टेशन के लिए जरूरी कोयला बिहार में ही था, फीर भी बिहार में अब तक सिर्फ दो पावर स्टेशन्स बने और उनकी पावर जनरेशन केपेसीटी भी 50-60 मेगावोट और 80-90 मेगावोट ही है. (बिहार सोशीयो-इकोनोमीक रीव्यू-2011-2012). सच तो ये है कि ओरीस्सा, छत्तीसगढ और झारखंड की गरीबी के लिए गुजरात जिम्मेदार है. परीमल नथवाणी नामका रीलायन्स का दलाल झारखंड का एमपी है, जिसे झारखंड से कोई लेना देना नहीं है. एक गुजराती हो कर भी मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं होता.  

नितिशकुमार के बिहार में तेंदुलकर कमीटी के निष्कर्ष अनुसार 54.5 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे जी रहे है. गुजरात में बीपीएल परीवारों की तादाद कुल आबादी का 16.8 फीसदी हिस्सा है. हालांकि यह सरकारी आंकडा है, और उस पर संदेह किया जा सकता है, फीर भी बिहार की तुलना में गुजरात की आर्थिक स्थिति अच्छी है. गुजरात में 20,59,380 हिन्दीभाषी लोग बसते है. सूरत में उनकी जनसंख्या 5,78,255 है. पूरे गुजरात में इंट भठ्ठो में अपने परीवार के साथ काम करते मजदूरों का, अहमदावाद, राजकोट, सूरत जैसे शहरो में रात को दो बजे तक मटन-खीमा की प्लेटें साफ करनेवाले बिहारी बच्चों का, दक्षिण राजस्थान से बीटी कोटन के खेतों में काम करने के लिए बीकनेवाली लडकियों की इसमें कीसीने गणना नहीं की.       

मंगलवार, 1 मई 2012

सी. आर. पाटील: एक लीस्टेड जकात-चोर, सांसद



1994 में मैं सूरत में नवगुजरात टाइम्स के साथ जूडा. मेरी सेलरी थी रू. 3000. जसवंत रावल मेरा तंत्री था. गोरा, सुंदर, सोफीस्टीकेटेड, मृदुभाषी. पहेले वह जनसत्ता में था. उसकी उम्र शायद मुझ से ज्यादा नहीं थी, मगर वह मुझे आदर से नहीं बुलाता था. पीछली दो-तीन नौकरियां मैंने आत्म-सम्मान की खातिर छोड दी थी, इस लिए सूरत गया तब मुझे मालुम था कि मैं यह नौकरी ज्यादा दिन करनेवाला नहीं हुं.

नवगुजरात टाइम्स का मालीक सी. आर. पाटील था. काला चहेरा और सफेद वस्त्र. पाटील की सिर्फ पांच शब्द में पहेचान देनी हो तो ऐसा कहना वाजीब था. गुजरात समाचार के मालीक श्रेयांस शाह, संदेश के फाल्गुन पटेल या समभाव के भुपतभाई वडोदरीया को जिसने भी देखा होगा, वे जब पाटील को देखते तो उन्हे लगता होगा कि गुजरात के तंत्री-मालीको के खानदान में यह विचित्र आदमी कहां से आ गया है. (श्रेयांस-फाल्गुन के कार्य अच्छे नहीं है, मगर वे दिखने में प्रेझन्टेबल जरूर है.) पाटील को कुछ लोगो लीस्टेड जकात चोर के नाम से बुलाते थे और कुछ अखबारो में तो यह विशेषण बडे प्यार से छपता था. मुझे याद है, उस वक्त गुजरात समाचार के निवासी तंत्री मयुर पाठक, जो आरआरएस से जुडे हुए थे ऐसा कहा जाता था, वे सप्ताह में दो-तीन बार इस लीस्टेड जकात चोर के नाम से स्टोरीझ छापते रहते थे.

नवगुजरात टाइम्स के दरवाजे पर सीसीटीवी केमेरा लगे हुए थे. पहलीबार मैंने किसी अखबार के दरवाजे पर ऐसे केमेरा मैंने देखे थे. मुझे बहोत आश्चर्य हुआ था. मैंने मेरे साथी कर्मीओं को पूछा, तो सब मुश्कुराने लगे. मुझे कहा, कल जब सीआर आए तब दरवाजे पर खडे रहो, पुरा नजारा देखने को मिलेगा. सब समज जाओगे.

दूसरे दिन मैं दरवाजे से कुछ अंतर पर खडा रहा. थोडी देर में तीन गाडियां आई. पहली गाडी में एक आदमी बंदूक लेके बैठा था. तीसरी गाडी में भी दूसरा आदमी बंदूक लेके बैठा था. बीच वाली गाडी में से खुद सीआर उतरे. उनके साथ भी एक सुरक्षा कर्मी बंदूक लेकर चलता था. मैंने ध्यान से देखा तो सीआर ने अपने पेन्ट तले बुट के मोजे में भी एक रीवोल्वर छुपाके रखी थी. इस आदमी को इतनी सारी सुरक्षा की क्यों जरूरत पड रही है? यह सवाल मेरे दिमाग में उठा था.

बाद में मैंने जाना कि दरवाजे पर लगे केमेरा का कनेक्शन सीधा पाटील की ओफिस में रखे टीवी से जुडा है. पाटील हंमेशां ओफीस में बैठे बैठे इस टीवी पर नजर रखता है. दरवाजे पर कोई आदमी आता है तो उसे तुरन्त मालुम पड जाता है. मेरे पत्रकार दोस्तों ने मुझे जब यह कहा, तब मेरा ह्रदय कांप उठा. वे कहते थे, सूरत में हर महिनें करीब 10-12 करोड की जकात चोरी होती है. 10-12 गेंग इस धंधे में लगी है. पाटील इन सब गैंग का डोन है. यह बात शायद गलत भी होगी. पाटील बेचारा सीधा सादा गृहस्थ भी होगा. मगर इसे इतनी सारी सुरक्षा की जरूरत पडती है, तो इस के लिए उसका अन्डरवर्ल्ड का कनेक्शन भी जिम्मेदार होगा ऐसा नहीं मानने का कोई कारण नहीं था. वह सरकार के भ्रष्टाचार का पर्दाफास करनेवाला कोई व्हीशलब्लोर तो नहीं था, जिसके सर पर मौत मंडराती हो.

पाटील काशीराम राणा का खास आदमी था. सूरत में बीजेपी को मजबूत बनाने में उसके चहेरे ने काफी योगदान दिया होगा. भारत माता को रक्षण के लिए ऐसे खास प्रकार के आदमियों की जरूरत है. सत्ता के बदलते समीकरणों ने पाटील को मोदी-भक्त बनाया है. अहमदाबाद में बिन-गुजराती कांग्रेसियों के खिलाफ पर्चे बांटने वाली बीजेपी सूरत में इस निरक्षर बिन-गुजराती को सांसद बनाने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती. गुजरात की अस्मिता में दरार नहीं पडती. पाटीलसाब मोदी-विरोधी नहीं है, तो गुजरात-विरोधी भी नहीं है.

पाटील आज सूरत में मोदी के लिए 50,000 बिहारियों का संमेलन बुला रहा है. गुजरात के स्थापना दिन पर बिन-गुजरातियों का संमेलन मोदी की देशभक्ति का अच्छा प्रमाण होगा. जिस बिहारियों के खिलाफ मुंबई में राज ठाकरे लोगों को भडका रहा है, उसी बिहारियों को गुजरात में कैसे प्यार से आवकार दिया जाता है. माइग्रन्ट बिन-गुजराती गुजरात के आर्थिक विकास में बडा योगदान दे रहे हैं, ऐसा कहने का मोदी को एक ओर मोका मीलेगा. गुजरात के इंटो के भठ्ठों में बिहार-झारखंड के दलित मजदूरों के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार होता है, उसके बारे में दो शब्द भी गुजरात के अखबारो में नहीं आएगा, इस अखबारों में एक अखबार का मालीक नवसारी का सांसद सी.आर. पाटील भी है.

बुटलेगरों के दोस्त, सस्पेन्डेड कोन्स्टेबल, सी. आर. पाटील की कुंडली लिखते हुए ता. 21 मार्च, 2009 का इन्डीयन एक्सप्रेस कहता है, "Tainted cop to PSU boss to wannabe MP, it has been quite a journey for Chandrakant R Patil (55), BJP candidate for Navsari this Lok Sabha polls. Patil was suspended from the police for his alleged involvement in illegal liquor trade in dry Gujarat, and even jailed for failing to repay hefty loans to a cooperative bank. But now, he will make his debut at the hustings this year.

His story begins after he joined the Surat police in 1975 as a constable. He first courted trouble after a liquor hoard was recovered from a bootlegger’s house in Palsana taluka in 1978 and his name cropped up in the police records as one of those involved.

The same year, another prohibition case was registered against him at the Songadh police station. Patil was arrested by the Surat police Task Force and was finally suspended for six years from the job.

He remained clear of more trouble for a while, though police sources allege that his dalliance with the illegal liquor trade continued. Patil resumed his police job in 1984 and soon invited another suspension: this time for trying to form a police union. Later, he allegedly came into contact with the then-rampant octroi evasion racket, with the backing of some textile mill owners. The Surat Municipal Corporation charged a case of octroi evasion against him in 1995. Meanwhile, politics beckoned, and Patil joined the BJP in 1990. In four short years, he became the Surat district president."

छ महिने के बाद मैंने जब नौकरी छोडी तब मेरा एक महिने का पगार बाकी था. पाटील के पास मेरे रू. 3000 अब भी उधार है. पाटील फेक्ट्री एक्ट का पालन नहीं करते थे. आज पहली मे के मजदूर दिन पर गुजरात का एक पूर्व पत्रकार बडे दुख से इस बात को याद करता है. जय जय गरवी गुजरात. 

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

वंचित समुदायों की सत्ता में भागीदारी - अहमदाबाद में संमेलन


जिन्होने पसमांदा मुस्लीम महाज का गठन
किया, मसावात की जंग किताब में धर्मांतरीत
दलितों की दिल दहेलानेवाली दास्तान लिखी,
ऐसे अली अनवर को
इस संमेलन में बुलाने का एक मकसद था.

देश की आजादी के 58 साल बाद भी वंचित समुदायों के लिये आरक्षण की मांग क्यों उठती है? निजी या सार्वजनिक, किसी भी क्षेत्र में आरक्षण लाने की चेष्टा का इतना हिंसक विरोध क्यों होता है? इन दो प्रश्नों के आसपास घूमती राजनीति में वंचित समुदाय कहां है? राज्यसत्ता में उनकी भागीदारी कितनी है? इसका मूल्यांकन करने के लिये ता. 6 अगस्त, 2006 को अहमदाबाद में एक विशाल संमेलन का आयोजन किया है। उसका विषय है, "वंचित समुदायों की सत्ता में भागीदारी"। इस विषय की सर्वांगी चर्चा तो हम उपरोक्त संमेलन में करेंगे ही, परन्तु इसके पहले इस संमेलन के आयोजक संस्थायें इस विषय में अपनी भूमिका स्पष्ट करना चाहती है।

बात शुरु होती है 1981 से ....

गुजरात के राजकरण में 1981 का वर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इस साल गुजरातभर में भयानक, जाति-द्वेषी, हिंसक आरक्षण विरोधी दंगे हुए थे। दो हजार साल से जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था के कारण राज-काज, न्याय-प्रशासन, शिक्षण जैसे क्षेत्रों में वर्चस्व जमानेवाले सवर्णों के द्वारा शुरु किये इस हुल्लड में सात दलितों की हत्या हुई, अहमदाबाद, देत्रोज, ऊतरसंडा सहित असंख्य स्थानों पर दलितों के झोंपडियां जलाई गई। फलस्वरुप, उसके बाद के वर्ष में दलितों ने होली के त्यौहार का बहिष्कार किया, अहमदाबाद के टेगोर हॉल में और बाद में खास-बाजार के मेदान में दलित पेंथर की पहल से आयोजित दलित-मुस्लिम-लघुमती संमेलनों में हजारों लोग उपस्थित हुए। जिससे चौंक उठे संघ परिवार ने हिन्दु धर्म के संतो-महंतो-स्वामियों का साथ लेकर दलितों, आदिवासीओं और अन्य पिछडे वर्गो के लोगों को हिन्दु धर्म की बगल में रखने के लिये मुस्लिमो को "टार्गेट" बनाकर कोमी दंगो का सीलसीला शुरु किया।

अहमदाबाद के सवर्ण बहुल क्षेत्रो में मुस्लिमों का रहेना अब मुश्किल होने लगा था, जिसकी वजह से वे 1981 के बाद कोट के अंदरुनी विस्तारो में स्थांलतर करने लगे। इस प्रक्रिया का अंत में भोग बने दलित। पिछले पच्चीस सालों में कोट के अंदर के मुस्लिम-बहुल विस्तारों में दलितों के करीब बीस मोहल्ले खाली हो गये। 1981 के बाद जन्मी दलितों की युवान पीढी को समझ आयी तब से वह मुस्लिम-विरोधी विषयुक्त वातावरण में पली और केसरीया रंग से रंग गई। उसी तरह मुस्लिमों की युवा पेढी भी दलित-मुस्लिम एकता के इतिहास को भूलकर दलित-विरोधी बन गई।

1985 के बाद जब कांग्रेस उसकी भ्रष्ट नीतियो के कारण खत्म हो रही थी, तब रउफ वली उल्ला जैसे सज्जन राजपुरुषो की निर्मम हत्या के कारण मुस्लिमों का बचाखुचा नेतृत्व भी खत्म हो गया। इस समय हिन्दुत्व की लहर पर सवार हुई भाजपा ने राजकीय शतरंज में मैदान मार लिया। उसी समय दौरान गुजरात साहित्य परिषद के अध्यक्ष पद पर विश्व हिन्दु परिषद के प्रमुख के. का. शास्त्री की नियुक्ति करके गुजरात के साहित्यकारों ने अपनी कट्टर मानसिकता का परिचय दिया। के. का. शास्त्री जैसे कट्टरपंथी को गुजराती साहित्य परिषद का अध्यक्ष बनाकर गुजराती साहित्यकारो ने "हिन्दुत्व" को न्यायोचित साबित किया।

हिन्दुत्व के एजेन्टः कल और आज

1985 में बक्षी पंच के तहत शामिल की गई जातिओं को मिले 27 प्रतिशत आरक्षण के खिलाफ फिर से गुजरात-व्यापी आंदोलन शुरु हो गया, तब गुजरात बंद के समर्थन में मंदिर भी बंद रहे। 1981 से 1985 के दौरान बक्षी पंच में समाविष्ट वाघरी, रबारी, ठाकोर, खारवा, कोली जैसी जातिओं का पांडुरंग आठवेल जैसे धूर्त धर्मगुरुओं ने हिन्दुत्व का अफीम पीलाकर बेहोश बनाने का अभियान शुरु किया। पांडुरंग कहेता था "कोई भी व्यक्ति कोई भी धंधा कर सके यह विचार योग्य नही है, इसलिये राम ने शंबूक का वध किया था" (संस्कृति चिंतन, पा.-147)
   
पिछले साल 2005 में जैनो को भडकाकर सर्वोच्च अदालत में कतलखानों को बंद करने की रिट करनेवाले जैन साधु चंद्रशेखर विजयजी भी 1981 के बाद पांडुरंग आठवले की तरह सवर्णों को भडकाने में सक्रिय हुए थे। पिछडे वर्गों के खिलाफ हलालह विष उगलता चंद्रशेखर विजयजी कहता है कि "एक समय ऐसा आयेगा कि राजकरण के प्रशानिक क्षेत्र में सभी जगह बी.सी. का प्रभुत्व हो जायेगा। राष्ट्रपति बी. सी., प्रधानमंत्री बी. सी., बैंक में बी. सी., लश्कर में बी.सी. सभी जगह उनके आधिपत्य के नीचे आ जाएगी भारत की बलवान प्रजा क्षत्रिय, वेद, विद्या-व्यासंगी प्रजा ब्राह्मण, बुद्धिमान प्रजा जैन!"

"इससे किसी का कल्याण नहीं हो सकता। बी. सी. का भी नही, क्योंकि इन क्षेत्रों में उनका काम नहीं है। वहां जिस प्रकार की शक्ति, बुद्धि वगेरे की जरुरत है, वह उन्हें विरासत में मिली ही नहीं है। सिर्फ शिक्षण से सब कुछ नही मिलता। उन्हे उंचा लाने का कोई दूसरा रास्ता भी नही है।"

"संस्कृति के जानकार कहते है कि उन्हे उंचा लाना हो तो उनकी रोजी-रोटी का वंशपरंपरागत जो व्यवसाय था, वह वापस लाना होगा। हरिजनों को उनका हाथशाल का धंधा, गिरिजनो को उनके अडाबीड जंगल वापस सोंप देने पडेंगे।"

"जगजीवनराम जैसे किसी को प्रधान बना देने से, एक ही नल से सब को पानी पिलाने से सब का पेट नही भरनेवाला। यह तो धोखाधडी है। पिछडी कही जानेवाली जातिओं को गलत रुप से भडकाकर उन्हे बर्बाद और बेहाल करने की कूटनीति है।" ( अब तो तपोवन ही तरणोपाय, पा.47)

हिन्दुत्व के इन एजेन्टो ने भाजप के राजकीय उदय में बहुत बडा योगदान दिया था।

मुस्लिमों का राजकीय नुकसान किसका फायदा?

1981 के समय में गुजरात विधानसभा में नव मुस्लिम धारासभ्य थे। (बोक्स) आज मुस्लिमों का प्रतिनित्व करनेवाले सिर्फ तीन धारासभ्य है। पिछले पच्चीस वर्षों की यह फलश्रृति है। जिन 6 बैठकों पर पहले मुस्लिम धारासभ्य चुने जाते थे, उन बैठकों पर अब सवर्ण धारासभ्य चुने जाते है। इसमें भी 6 बैठक तो भाजप ले गया है। इस तरह मुस्लिमों की बैठकें घटी, जिससे दलित, आदिवासी या फिर बक्षी पंच की बैठके बढी नही है। मुस्लिमों का राजकीय नुकसान उच्च सवर्ण जातिओं (बानिया, ब्राह्मण, पटेल) के लिये राजकीय फायदे में परिवर्तित हुआ। मुस्लिमों के राजकीय नुकसान से दलित, आदिवासी या फिर बक्षी पंच की जातिओं कोई राजकीय फायदा नही हुआ।

हिन्दुत्व की लडाई का मतलब है "खाने में सवर्ण, पिसने में पिछडे"। जाति निर्मूलन समिति के संशोधन के अनुसार, 2002 के कोमी दंगो में अहमदाबाद में हुए 2945 धरपकड़ में 797 बक्षी पंच के लोग, 747 दलित, 19 पटेल, 2 बनिया और 2 ब्राह्मण थे। जेल में आदिवासी और बंझीपंच के लोग और विधानसभा में गये सवर्ण।

क्रम
बैठक
1981 के समय
वर्तमान धारासभ्य
 1
वांकानेर
पीरजादा मंजुर हुसैन
ज्योत्सना सोमाणी (भाजप)
2
जामनगर
महमद हुसेन बलोच
वसुबेन त्रिवेदी (भाजप)
3
सिध्धपुर
शरीफभाई भटी
बलवंतसिंह राजपूत (कांग्रेस)
4
गोधरा
अब्दुलरहीम खालपा
हरेश भट्ट (भाजप)
5
ठासरा
यासीनमिंया मलेक
रमेश शास्त्री (भाजप)
6
भरुच
महमद पटेल
रमेश मिस्त्री (भाजप)
7
सुरत (पश्चिम)
मोहमद सुरती
भावना चपटवाला (भाजप)
8
कालुपुर
मोहमद हुसेन बारेजीया
फारुक शेख (कांग्रेस)
9
जमालपुर
लालभाई कुंदीवाला
सबीर काबली (कांग्रेस)
  
हाल में ही मुस्लिमों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति के बारे में राष्ट्रीय अभ्यास में मालूम पडा कि देश के अधिकतर प्रदेशो में मुस्लिम दलितों के जितने ही सामाजिक, आर्थिक और शौक्षणिक रुप से वंचित है। मुस्लिम वंचित होने के बावजूद भी "तुष्टीकरण" का निर्लज्ज आक्षेप हिन्दुत्व के ठेकेदार करते रहते हैं।

आज का संकल्प

गुजरात का वर्तमान राजकरण अंधे मुस्लिम-विरोध की धुरी पर घूम रहा है। हिन्दुत्व के ठेकेदार चाहते हैं कि गुजरात के वंचित समुदायो की सत्ता में भागीदारी का मुद्दा एजेन्डा पर आये ही नही और वह मुस्लिम विरोधी गुब्बारो में घूमते फिरे। अभी के दिनो में एक तरफ, आरक्षण विरोधी आंदोलन चल रहा था तो दूसरी तरफ अहमदाबाद के राजपुर-गोमतीपुर के मुस्लिम एक दूसरे पर पथ्थर मार रहे थे। जिनके हक छिने जा रहे है, वही लोग अंदर ही अंदर लडते रहे ऐसा तख्ता हिन्दुवादी ताकतो ने तैयार किया है। सच्चिदानंद के आरक्षण- विरोधी उच्चारण इसी संदर्भ में देखना चाहिए. सच्चिदानंद जैसे तथाकथित संत ही वर्तमान भाजप सरकार के चुस्त समर्थक है यह भी हमे जान लेना चाहिये।

"वंचित समुदायो का सत्ता में भागीदारी" यही हमारी मांग है। परन्तु, सत्ता छीनने के लिये वंचितो की एकता महत्वपूर्ण है। 2002 के कोमी दंगो के बाद गुजरात में हमने नोंधपात्र कामगीरी की है। इस कार्य को आगे बढाने के लिये वंचित समुदाय के बीच काम करते संगठनों में एकता जरुरी है। अब वंचित समुदायो को आपस में लडने के बजाय राजकीय सत्ता प्राप्त करने के लिये लडना होगा ऐसे संकल्प के साथ इस संमेलन को सफल बनाते है।

- राजु सोलंकी

6 अगस्त, 2006. अहमदाबाद में जाति निर्मूलन समिति, अमन समुदाय तथा वंचित समुदायो में कार्यरत पचास से ज्यादा संगठनो  द्वारा संपन्न संमेलन की कन्सेप्ट नोट. संमेलन को अली अनवर, डा. आनंद तेलतुंबडे, प्रो. चीनोई, मुकुल सिंहा ने संबोधन किया था. 

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

एक थे वली गुजराती

एक थे वली गुजराती (1667-1707).
 उर्दू में गज़ल लीखनेवाले प्रथम कवि. गुजरात को
करते थे प्यार, इस लिए कहलाए वली गुजराती.
जन्म हुआ औरंगाबाद में, मृत्यु हूई अहमदाबाद में,
वहां उनकी बनी मजार

2002 के दंगों मे मजार नष्ट कर दी गई और
उसकी जगह हनुमान का मंदिर बनाया गया
भगवान का मंदिर स्वच्छ, पवित्र जगह पर होता
है, मगर पागल कट्टरपंथियों ने वली की मजार
तोडकर कूड़े-कचरे की डम्पींग साइट पर
हनुमान का मंदिर बनाया
आज वह जगह एक दलित दंपति के जीवन निर्वाह
का स्रोत है. वे वहां दिनभर बैठते हैं, कूड़े-कचरे में
से प्लास्टीक की थैलियां, वगैरह निकाल कर
बैचते है.
हमें देखकर उनके थके हूए चहेरों पर आ जाती है
रौनक, उन्हे लगता है, कोई तो है, जो हमारे
 अस्तित्व की पहचान  करवाने के लिए बेताब है.
वह है जीवीबेन लेउवा और उनके पति.
वे शाहीबाग, घोडा केम्प एरीया में रहते है.
 उनको देखा उसी क्षण मुझे मालुम था कि यह
मेरे लोग है, फीर भी मैंने पूछा, आप की जाति
क्या है, जीवीबेन ने कहा, चमार
क्या आपकी कोई संतान नहीं है, मैंने पूछा.
बुज़ुर्ग ने जवाब दिया, दो बेटे थे. एक बेटा 
दशामा के विसर्जन के दौरान नदी में डूब गया,
दूसरा खड्डे खोदने जाता है.

हमारे बारे में कुछ लिखना 
बीपीएल कार्ड है, मगर कोई काम का
नहीं है
संकटमोचन हनुमान मंदिर के मालिक-पुजारी
अभिषेक शास्त्री-जोषी रमणलाल
मंदिर में दिनभर ताला लगा रहेता है,
पुजारी स्टोक मार्केट में जाता है
या सीफीलीस की ट्रीटमेन्ट करवाने,
किसे पता...

एक कडवा सच - बम्मन लोग दलितों,
 आदिवासियों, पीछडी जातियों के लोगों को
 उक्साते हैं, उनके हाथों मुसलमानों की
मस्जिदें, मजारें तूडवाते हैं और फिर
धरम के नाम पर धंधा शुरू करते हैं.
मंदिर के पास पीने के पानी की टंकी, जो बनाई
गई है स्व. प्रेमवतीबेन दामोदरदास अग्रवाल
के नाम पर, जो लोग अहमदाबाद के प्रमुख
कोमोडीटीज़ बाज़ारों को कन्ट्रोल करनेवाले
मीलीयोनेर मारवाडी बनीया है, जिन्हे गुजरात
की अस्मिता, गौरव से कोई लेना देना नहीं है

(फोटोग्राफ्स - जयेश सोलंकी)


















गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

गुजरात के गौरव की पुन स्थापना के लिए - नागरीक पहल


प्रस्ताव

हम गुजरात के प्रबुद्ध साक्षरों, लेखकों, साहित्यकारों, कविओं, नाट्यकारों, रंगकर्मीओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, कर्मशीलों, शिक्षाविदों, समाजचिंतको एवं शांतिचाहकों गुजरात की अग्रणी, साहित्यसेवी संस्था गुजराती साहित्य परिषद के अध्यक्ष पद पर विश्व हिन्दु परिषद के प्रमुख केशवराम का. शास्त्री की सन् 1985 में हुई नियुक्ति के लिये अफसोस और खेद महेसूस कर रहे हैं. हम मानते हैं कि उनकी नियुक्ति से गुजरात को धार्मिक कट्टरपंथ की ओर ले जानेवाली ताकतों को बल मिला था. विश्व हिन्दु परिषद और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के साथ जुडी संस्थाओं ने एकत्र होकर गुजरात में सन् 2002 की घातकी और अमानवीय घटनाओं के लिये जिम्मेदार वैचारिक भूमि तैयार की थी. गुजरात के गौरव को कलंकित करनेवाली ऐसी घटनायें भविष्य में ना हो उसके लिये संपूर्ण संवेदनशीलता के साथ सर्तक रहने की निसबत से हम ये प्रस्ताव पारित करते हैं.

                अहमदाबाद  ता. 12.4.2012