19 अगस्त, 2012 गुजरात के साणंद में आंबेजकर दलित परिषद के
कार्यक्रम में कांचा इलैया, डॉ. नीतिन गुर्जर, डॉ. श्यामल पुराणी, बाबु
पेन्टर, मोझेझ परमार, बाबुभाई कतपरा तथा राजु सोलंकी
ओस्मानीया
युनिवर्सीटी के प्रो. कांचा इलैया अपनी किताब 'व्हाई
आइ एम नोट हिन्दु' से ज्यादा प्रसिद्ध है. उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि से
ऐसा लगता था कि वह दलित है, मगर उन्हो ने बताया कि वह गडरीया (गुजराती में भरवाड)
समुदाय से है, जो आंध्र प्रदेश में ओबीसी है. कांचाजी के खयाल काफी रसप्रद है. वे
कहते है, ''देश में दूध के उत्पादन में भैंस का प्रदान 70
प्रतिशत है. सिर्फ हिन्दु ही नहीं, बल्कि हिन्दु के देवी-देवता भी भैंस का दूध
पीते हैं. फिर भी गाय को माता क्यों कहते है?'' कांचाजी का तर्क यह है कि भैंस काली है और गाय सफेद,
इसलिए गाय को आर्यलोग पसंद करते थे, जबकि भैंस का काला रंग अनार्यों का रंग था.
अच्छा खासा फैटवाला दूध देने के बाद भी बेचारी भैंस को माता नहीं कहा जाता.
कांचाजी
गुजरात के किसी भी दलित साहित्यकार, कर्मशील को जानते नहीं थे, सिवाय के एक एनजीओ.
हमने उनको जोसेफ मेकवान, नीरव पटेल, साहिल परमार, दलपत चौहाण वगैरह साहित्यकारो के
बारे में बताया. जोसेफ मेकवान की किताब 'आंगळियात' राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित
है, फिर भी कांचा उन्हे जानते नहीं थे. हमने कांचाजी को वालजीभाई पटेल के बारे में
बताया, जिनकी संस्था काउन्सील फोर सोशल जस्टीस ने एग्रीकल्चरल लेन्ड सीलींग एक्ट
के तहत दलितों को कागज पर बांटी गई जमीन के वितरण का अच्छा काम किया है, जिसकी
पूरे देश में कोई मिशाल नहीं है. अभी मुझे एक दोस्त ने बताया कि कांचा जोसेफ
मेकवान वगैरह साहित्यकारों के साथ डरबन युएन की कोन्फरन्स में थे. लगता है, हम एक
ही देश में एकदूसरे से परिचय बनाने के बजाय आंतरराष्ट्रीय परिषदो के पीछे ज्यादा
समय व्यतीत करते है. थीन्क ग्लोबली, एक्ट ग्लोबली एन्ड नथींग वील हेप्पन लोकली.
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