राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में शामिल होते वक्त हर कार्यकर्ता एक प्रतिज्ञा लेता है:
"सर्वशक्तिमान
श्री परमेश्वर एवम् हमारे पूरखों का स्मरण करके मैं यह प्रतिज्ञा करता हुं कि
हमारे पवित्र हिन्दु धर्म हिन्दु संस्कृति तथा हिन्दु समाज का संरक्षण करके हिन्दु
राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने के लिए मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा
बना हुं. मैं संघ का कार्य प्रमाणिकता से, निस्वार्थ बुद्धि से और तन-मन-धन से
करुंगा. यह व्रत का पालन मैं आजीवन करुंगा."
संघ
के समर्थक कहते हैं कि इस प्रतिज्ञा में कहीं भी मनु का कोई उल्लेख नहीं है, फिर
भी संघ को बिना वजह मनुवादी कहा जाता है. संघ का लेखित संविधान है. इस संविधान की
प्रस्तावना इस तरह है:
"आज
देश की विघटीत स्थिति में,
a. हिन्दुओं के विभिन्न पंथ, मत,
संप्रदाय के कारण उत्पन्न भेद, और इसी तरह आर्थिक, भाषा तथा प्रांतीक वैविद्य के
कारण पैदा होनेवाले भेदों
को दूर करने के लिए-
b. उन्हे
(हिन्दुओं को) उनके उज्जवल अतीत का स्मरण कराने के लिए,
c. हिन्दुओं में सेवा, त्याग और
निस्वार्थ-भक्तिभाव का निर्माण करने के लिए
d. इस तरह संगठित तथा अनुशासित जीवन
उत्पन्न करने के लिए-
हिन्दु समाज का सर्वांगीण पुन:जीवन
करने के लिए एक संगठन की आवश्यकता महेसूस हुई. तद् अनुसार सन 1925 में विज्यादशमी
के शुभ मुहुर्त पर स्व. डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम
से एक संगठन का प्रारंभ किया."
इस प्रतिज्ञा ध्यान से पढें. स्वयंसेवक पवित्र हिन्दु धर्म,
हिन्दु संस्कृति तथा हिन्दु समाज का रक्षण करने की प्रतिज्ञा लेता है. उसे ऐसी
प्रतिज्ञा लेने की क्यों जरूरत पडी? आगे बताया गया है कि "आज
देश की विघटित स्थिति में" ऐसी प्रतिज्ञा लेने की जरूरत पडी है. विघटित स्थिति
का क्या अर्थ है? विघटन
का आधार "आर्थिक, भाषा तथा प्रांतीक वैविध्य" है. दो हजार साल पहले भी
कुछ लोग अमीर थे, कुछ लोग गरीब थे. मगर समाज विघटित नहीं था. क्योंकि उस वक्त समाज
धर्म के, वर्णव्यवस्था के अनुशासन से बंधा हुआ था. अब आधूनिक समय में जब समाज में
विघटनकारी शक्तियां, समाजवाद, साम्यवाद,
मार्क्सवाद जैसी विचारधाराएं सक्रिय हुई है, तब हिन्दु समाज को संगठित करने के लिए
संघ का निर्माण हुआ है. प्राचीन भारत में भी बुद्ध और
महावीर के रूप में ऐसी "विघटनकारी"
शक्तियां थी, जिसे हराने के लिए मनु ने मनुस्मृति का निर्माण किया, समाज को संगठित
किया. संघ परिवार अब मनु का नाम लिए बिना समतामूलक विचारधाराओं से लड रहा है.
संघ की स्थापना 1925 में हूई थी. तब देश में जाति-धर्म के आधार पर आबादी की
गणना शूरू हो चूकी थी. 1881 में जब पहली बार गणना हूई, तब हिन्दु को पहचानने के
लिए कोई मानदंड नहीं था. इस लिए अंग्रेजो नें 'मुसलमान' और 'गैर-मुसलमान' ऐसी
दो केटेगरी तय की थी. मुसलमान को पहेचानना सरल था, उसकी निश्चित आइडेन्टीटी थी.
मुसलमान को छोडकर बाकी सभी लोगों को 'गैर-मुसलमान'
केटेगरी में डाल दिये गये थे. फिर दस साल बाद, इस 'गैर-मुसलमान'
केटेगरी में से 'अछूत' को अलग करने के लिए दस
मानदंड तय किये गये. बाबासाहब अंबेडकर ने यह सारी प्रक्रिया का वोल्यूम पांच में
अच्छा विवरण किया है. 'हिन्दु' को अपनी पहेचान देने के
लिए संघ अंग्रेजों का ऋणी है, मगर संघ अंग्रेजों को 'थेंक
यु' नहीं बोलेगा, क्योंकि उसी अंग्रेजों में से एक
राम्से मेकडोनाल्ड ने कोम्युनल एवार्ड देकर (संघ के मुताबिक) हिन्दुओं को विभाजित
किया था.
संघ और गांधीजी दोनों की विचारधारा का स्रोत यह
पवित्र हिन्दु धर्म है. संघ के स्वयंसेवकों के पास अभी जो लाठी है, वह सचमुच महात्मा
गांधी की है, इस बात में मुझे कोई शंका नहीं है. संघ और गांधीजी दोनों अपने आपको
तथाकथित 'अछूतो' के संरक्षक समजते है. 'अछूतों' का नेतृत्व संघ और गांधीजी दोनों को पसंद नहीं है. संघ के 'हिन्दु राष्ट्र' और गांधीजी के
रामराज्य में ज्यादा फर्क नहीं है. बीसवीं सदी में पूरी दुनिया में इतना बडा मूल्य
परिवर्तन हुआ था, कि अस्पृश्यता का समर्थन करने की किसीकी भी हिंमत नहीं थी. इसलिए
गांधीजी कहते हैं, कि शंबुक की कथा क्षेपक (बाहर से डाली गई) है. मगर यह गांधीजी
का निजी अभिप्राय था. हिन्दु समाज गांधीजी के इस अभिप्राय से सहमत नहीं था.
कौटिल्य ने कहा था कि जिस संगठन का मुखिया ब्राह्मण
ना हो उस संगठन में अराजकता होती है. मनु ने ब्राह्मण के सामाजिक, आर्थिक,
सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, धार्मिक नेतृत्व को थोपा था, इतना ही नहीं उसे 'दिव्य' स्वरूप दिया था. संघ
परिवार इस अर्थ में मनुवादी है.
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